Chaini Jot Pass Mindhal Churah Trekkiing (10)

चेहनी जोत यात्रा – चुराह से पांगी (2015)

हर साल मैं सर्दियां आने पर एक ‘लिस्ट’ बनाता हूँ और उस ‘लिस्ट’ में अगले साल के लिए ट्रेक लिखता हूँ। पिछले चार साल से मेरी लिस्ट में गड़ासरु महादेव और महाकाली डल का नाम है और निकट भविष्य में भी इनका नाम लिस्ट ‘में ही ‘ रहने की पूरी संभावना है। लेकिन जिस दिन ये पुराने नाम नयी यात्राओं को जगह देते हैं, उस दिन तो जीवन झींगा-ला-ला हो जाता है ।

चेहनी जोत का नाम भी मेरी लिस्ट में कम से कम चार-पांच साल रहा। 2015 में भी ये नाम रह ही जाता लेकिन भला हो उस गद्दी का जो हमें उस पार ले गया। चम्बा- चुराह-पांगी में आदि काल से गाइड-पोर्टर न मिलने की समस्या रही है। 2016 में हरीश कपाड़िया जी चुराह गए लेकिन उनको खुद अपने पोर्टर कुमाऊं से लाने पड़े।

तो आप अब समझ सकते हैं की चम्बा या चुराह का कोई नाम लिस्ट से हटे तो हर्षोउल्लास की कोई सीमा नहीं रहनी चाहिए , वैसा ही इस बार भी हुआ।

जहाँ दराटी पास की यात्रा में मैं अपना महंगा चश्मा खो आया था, वहीँ इस बार जोत पर पहुँचते ही मैंने अपना ‘ट्रैकिंग पोल’ जमीन पे दे मारा और उसके टुकड़े टुकड़े हो गए। वो दिन और आज का दिन, मेरा काम डंडे से ही चल रहा है। लेकिन मेरी ‘हैप्पीनेस’ बिलकुल सच्ची-खरी थी। आपको विश्वास नहीं है ये तो ये देखिये, चैनी जोत का नजारा:

चेहनी जोत, पीर पंजाल हिमालय

पंडित जी दिल्ली से चल, 16 घंटे बाद चम्बा पहुँचते हैं । चम्बा बस स्टैंड पे पूर्ण निर्धारित कार्यक्रम अनुसार परांठे खाने की बात हुई थी लेकिन सामने ‘भंजराड़ू-देवीकोठी’ की बस लगी देख के सब परांठे भूल जाते हैं। रस्ते में सोते जागते भंजराड़ू पहुंचे जहाँ केले और पकौड़े ही हाथ लगे, और इस तरह बिना ‘अन्न’ खाये हम लोग देवीकोठी पहुँच जाते हैं।

ट्रेक हैल से शुरु होता है जो देवीकोठी से भी 6 किलोमीटर आगे है, अब समस्या ये की न तो गाइड ही मिलता है और न ही ये जानकारी की गद्दी अभी आगे गए हैं या नहीं। जून के महीने में गद्दी निकल जाया करते हैं लेकिन 2015 में भारी बर्फबारी के कारण गद्दी ‘मूवमेंट’ पूरे हिमाचल में धीमा था। मंत्रणा के बाद निर्णय ये हुआ की चलो चलते हैं हैल, वहीँ मिलेगा कोई मेल।

मुश्किल से एक छोटी गाड़ी वाला मिलता है, जो अभी नौसिखिया है और जिसे लगता है की उसकी गाड़ी में एक ही गियर है वो भी पहला। पूरे 6 किलोमीटर वो आदमी पहले गियर में गाड़ी चलाता है और हम खुद को कोसते हैं की इससे बढ़िया तो पैदल निकल लेते। हैल गाँव दिखते ही हम लगभग चलती गाड़ी से कूद जाते हैं और अब हम खड़े हैं चुराह के अंतिम गाँव हैल में। हैल में कुछ गद्दी रहते हैं और कुछ गुज्जर और आज वो सब सांप्रदायिक एकता का प्रदर्शन करते हुए केवल हमें देखते हैं|

सबकी आँखों में एक ही प्रश्न:

ये कहाँ से आ गए?
अभी तो गद्दी भी नहीं गया
बर्फ बहुत है
रस्ता खराब है
मौसम तो देखो…

इस तरह की बातों के बीच सिर्फ एक बात काम की सुनाई पड़ती है, ” जड़ी बूटी निकालने वाले गए हैं आगे, आपको भी मिलेंगे”।

आज के दिन की यही अच्छी बात है, कोई तो आगे गया है, थोड़ा आगे चलते हैं तो लकड़ी के पुल पे काम करते मजदूर मिलते हैं, जिनसे एक और अच्छी जानकारी मिलती है की गद्दियों के बहुत से डेरे आगे बैठे हैं। कम से कम हजार- दो हजार भेड़ और सौ-पचास गद्दी। लगता है अपना काम बन गया, अब जब गद्दी जाएगा तो हम भी निकल लेंगे।

Hail Village, Start of the Trek
हैल गाँव
देवीकोठी मंदिर से चेहनी जोत

अब हम घने जंगल में हैं, पहले ऊपर चढ़े कम से कम 300 मीटर, अब रस्ता एकदम नीचे जाता है नाले की ओर, वही नाला जो हमें हैल में मिला था। क्या रस्ता सही है? भटक तो नहीं गए? पंडित जी का कहना है चलते चलो, भगवती की ईच्छा होगी तो पहुँच जाएंगे, जिसपे मुझे गुस्सा आता है लेकिन चले चलते हैं। थोड़ी देर में नीचे उतरते हैं, तो नाले को ग्लेशियर खा गया ऐसा जान पड़ता है, जैसे चलते चलते पानी जम गया हो और पानी गायब। अब ग्लेशियर पे चलते हैं जो काफी चौड़ा और लम्बा है। शाम ढल रही है और बेचैनी बढ़ रही है। सामने ग्लेशियर और फैलता जाता है और अँधेरा बढ़ता जाता है।

लो अब बारिश भी शुरू हो गयी, जो कसर रह गयी थी, वो भी आज पूरी होकर रहेगी। तभी सामने से दो आकृतियां इंसानी रुप में प्रकट होती हैं और दो गद्दी हमें मिलते हैं। उनका कहना है की बस पहुँच गए, एक घंटे में एक बड़ा सा थाच(मैदान) आएगा वहां सब गद्दी बैठे हुए हैं। साथ ही ये भी जानकारी दे दी जाती है की बेटा, ” पास तो तुमसे न लांघा जाएगा, इतना बर्फ है”

अब बर्फ और पानी की लड़ाई में फिर पानी जीत जाता है, और सामने य्ये बड़ा सा मैदान है, चारों तरफ हरियाली है। बर्फ के सन्नाटे को पानी का संगीत तोड़ता है और स्पेशल इफ़ेक्ट के लिए कन्फ्यूज़ बकरी की मैं-मैं और ‘झंकार बीट’ के लिए और गुस्सैल कुत्तों का भूँकना काम कर जाता है। हमें देख के पहली बार गद्दी खुश नहीं होते।

हम कहते हैं हमें साथ ही रख लो, वो कहते हैं खाओगे क्या?
हम कहते हैं राशन लाये हैं, वो कहते हैं लकड़ी नहीं है

थक हार कर उन्हीं से पूछते हैं की फिर हम कहाँ रुकें? उनका कहना है जहाँ से आये हो, वहीँ वापिस जाओ 500 मीटर, फिर वहां से ऊपर चढ़ जाओ और 500 मीटर, वहां एक गुफा है, वहां सो जाओ।

अच्छा कल हमें ले तो चलोगे?
न भाई, अभी तो नहीं जाएंगे हम, बर्फ पिघलेगी तभी जाएंगे।

फिर हमें कौन ले जाएगा?
वहीँ गुफा में जड़ी बूटियों वाले बैठे हैं, वो ले जाएंगे, उनसे पूछना।

अब हम जोत के एकदम ‘बेस’ में हैं लेकिन अभी तक ये पक्का नहीं है की आगे जाएंगे या नहीं, और जाएंगे तो कैसे जाएंगे?

मार्गदर्शक गद्दी

गुफा तक कुत्तों ने हमारा कुत्ता बना दिया, ऐसा लगता है जैसे ये कुत्ते भी नहीं चाहते की हम आगे जाएँ। गुफा तक का रस्ता पथरीला है, ऊपर से बारिश की मार, अब गुफा में भी रहने की जगह न मिली फिर क्या करेंगे? यही सोचते सोचते गुफा आ जाती है और अच्छा लगता है की वहां आग और जमीन का प्रबंध है।

गुफा काफी बड़ी है, इतनी बड़ी की एक साथ 25 -30 लोग आ जाएँ। रिजुल फुर्ती से टेंट लगाता है और पंडित जी कहते हैं की चम्बा में परांठे खा लेते तो बढ़िया रहता। खिचड़ी बनती है, थोड़ी थोड़ी खाते हैं और 15 मिनट में तीनों ढेर। सुबह उठते हैं तो सामने बादल है, पीछे और भी काला बादल है, लगता है बारिश होगी। जड़ी बूटी वाले कह देते हैं की बारिश खुलेगी तो आगे जाएंगे नहीं तो यहीं जमे रहेंगे।

पंडित जी कहते हैं की आज गए तो गए नहीं तो मैं कल वापिस मुड़ जाऊँगा। जड़ी बूटी वाले कभी मानते हैं, कभी नहीं मानते, अंततः एक आदमी तैयार होता है, जिसे हम 1500 रूपये में तैयार करते हैं। और अगली सुबह तीनों गुफा से जोत की ओर प्रस्थान करते हैं।

सुबह वहीँ से निकलते हैं जहाँ से एक दिन पहले वापिस मुड़ गए थे, वहां गद्दी अभी भी आगे जाने को तैयार नहीं हैं। थोड़ी दूरी पे एक और बड़ा मैदान आता है, अब सोचते हैं की पिछली रात यहीं रुक जाते। अब फिर नाला गायब होता है और बर्फ के साम्राज्य में घुसते हैं। बर्फीले साम्राज्य में कहीं से भी भनक नहीं लगती की जोत किस ओर है। जड़ी बूटी वाला भला आदमी है, अपनी कुल्हाड़ी से रस्ता काट रहा है, रस्ते की पहचान कर रहा है जो बर्फ से दबा हुआ है। कुल्हाड़ी मार मार के उसका हाथ दुखता है और हमारे पैर। बर्फ पे चलना आसान काम नहीं है, नरम बर्फ बिलकुल भी घर्षण नहीं देती और जितना दबाओगे उतना दबेगी। अब जितना दबेगी उतना ही जोर लगाना पड़ेगा उठाने के लिए।

चलते चलते चार हजार मीटर से जोत दीखता है, झंडे हैं, त्रिशूल हैं और कुछ लोग भी खड़े हैं। अब दिख गया तो पहुँच भी जाएंगे, लेकिन मेरी सोच को बर्फीला झटका लगता है और एकदम से जड़ी-बूटी एक्सपर्ट सीढ़ी खड़ी पहाड़ी पे आने का इशारा करता है। गिरते पड़ते ऊपर पहुँचते हैं और पहुँचते ही ‘जय भद्रकाली’ के उद्घोष के साथ मैं कूदता हूँ जिससे मेरा ‘ट्रैकिंग पोल’ धराशायी हो जाता है। मौसम खराब हो रहा है, जड़ी बूटी वाला पूजा करता है और निकल लेता है। जो लोग कुछ देर पहले ऊपर खड़े थे वो पांगी से आये थे, वो भी जड़ी बूटी वाले के साथ निकल लेते हैं।

अब हम हैं, सामने लाहौल की पहाड़ियां हैं, नीचे बर्फीला रेगिस्तान है और नीचे एकदम खड़ी पहाड़ी। पहले मैं देखता हूँ, फिर पंडित जी और फिर रिजुल। रिजुल का कहना है की कहाँ फंसा दिया, रुआंसा सा होकर वो घबरा जाता है, पंडित जी कहते हैं पहले मैं कूदता हूँ, और मैं भी यही कहता हूँ की पहले आप। अंततः मुझे ही कूदना पड़ता है, टांग बर्फ के नीचे दबे पत्थर से टकराती है और चोट मानो दिमाग में लगती हो। दूसरा नंबर पंडित जी का लगता है जो टांग बचाने के चक्कर में अपनी बांह पत्थर पे दे मारते हैं। ऊपर रिजुल है, उसकी टांगें काँप रही हैं, गुस्से में अंड-बंड बक रहा है, कभी टेढ़ा हो रहा है तो कभी लेट रहा है, बस कूद नहीं रहा। मैं उसे भांति भांति की गालियां देता हूँ, उकसाता हूँ, फिर कहीं जाकर वो कूदता है – सीधा मेरी ’56 इंच की छाती पर’। अब तीनों अपने अपने जख्म सहलाते हैं, और हँसते हैं। रिजुल का कहना है की बहुत डर भी लगा और बहुत मजा भी आया।

मेरा उन दोनों को कहना है – घंटा

खुली गुफा
गुफा के बाहर टेंट
गुफा के बाहर पंडित जी
Patahar Basecamp, Chaini Pass Visible
गुफा से आगे दूसरा चौड़ा मैदान
Brotherhood of Ice Axe
संघर्षरत रिजुल
Chaini Pass Top - Churah to Pangi, 14400 feet
चेहनी जोत

अब बर्फ है, चारों ओर, बर्फीला रेगिस्तान और रास्ता बियाबान। चलते चलते पंडित जी परांठे याद करते हैं और सोने की ईच्छा बताते हैं, जो ग्लेशियर हमें कल गद्दी के डेरे में मिला था, वो अब किसी तरह पहाड़ी के इस ओर आ गया मानो हमारा पीछा करता हो। पंडित जी को बुखार है, रिजुल बेकरार है और मेरा बुरा हाल है।

शाम हो चुकी है, गाँव दूर है, रिजुल की जिद है जल्दी चलो, मेरा कहना है चलो जैसे भी बस बहस मत करो। अब लड़ते झगड़ते बहस करते हुए अंततः गाँव में आते हैं, तो एक सूअर किस्म का बहुत ही नीच कुत्ता हमारा स्वागत करता है। थके हारे आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं होती, हमारी कमजोरी देखकर कुत्ता भी अपने साथियों को बुला लाता है। अब बार्डर के इस पार हम, और उस पार कुत्ते।

रात के 9 बज रहे हैं, कुत्ते केजरीवाल ‘मोड’ में जा चुके हैं, अब उनसे पार पाना तार्किक रूप से संम्भव नहीं है। थक हार कर पोलिस को फोन करते हैं की हमें ले जाओ, हम कुत्तों से हार गए। पर पोलिस का फोन मिलता है शिमला और शिमला वाले कहते हैं की य्ये लो लोकल थाने में फोन मिला लो। लोकल थाने में फोन नहीं मिलता, फिर दुलर साहब की याद आती है। दुलर साहब मंडी जिला में पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं, अभी (2015 में ) कांगड़ा में कार्यरत हैं, उनका कहना है जहाँ हो वहीँ रहो, मैं दल-बल भेजता हूँ।

कुछ देर में नीचे चंद्रभागा की घाटी में पोलिस की गाडी दिखती है, जिसे मैं अपनी टोर्च जला-बुझा कर इशारा करता हूँ तो वो भी समझने का इशारा करते हैं। कुत्ते हमारी चाल को समझने का इशारा करते हैं और अब डबल स्पीड से भौंकते हैं। पंडित जी सो चुके हैं, रिजुल कब से क्या कहे जा रहा है, ये समझने की मेरी शक्ति जा चुकी है।

पोलिस आते ही हलचल मचती है, पंडित जी जागते हैं और उनका अब भी यही मानना है की परांठे खा लिए होते तो ये सब नहीं होता

थोड़ी देर में पोलिस आती है,
हमें रेस्क्यू करने को
रस्ते में कुत्ते खड़े हैं
हमें कैप्चर करने को
मैं एक लात मारता हूँ
अनपढ़ कुत्तों को पेलने को
और इस तरह से
चेहनी जोत की यात्रा समाप्त होती है

Chaini Jot Pass Mindhal Churah Trekkiing (17)
लाहौल की पहाड़ियां
बर्फ का साम्राज्य

पंडित जी 25 किलोमीटर चलने के बाद, चार घंटा सोते हैं, और अगली सुबह फिर निकल पड़ते हैं अपनी घर की ओर
पांगी से उदयपुर तक ट्रक में बैठ कर

अंग्रेजी में पढ़ना हो तो यहाँ पढ़ लें: चेहनी जोत यात्रा (अंग्रेजी में)

8 thoughts on “चेहनी जोत यात्रा – चुराह से पांगी (2015)”

  1. जानता हूँ फोटो के हिसाब से जगह महाभयंकर होगी, शानदार क्लिक्स और जानदार कुत्ते वैसे पराठे खा लेते तो अच्छा रहता ।

  2. Really amazing..
    मजा आ गया
    गोयल साहब सब को मिलाकर एक किताब लिखो हिंदी और इंग्लिश दोनो भाष में हो किताब। उस मे ये सब अदभुत अनुभव हो
    ओर किताब का नाम हो
    हिमालय एक खोज
    किताब धूम ना मचा दे तो नाम बदल देना मेरा

  3. शानदार वृतांत, पढ़कर मज़ा आया ! वैसे पराठे खा लेते तो ये सब नही झेलना पड़ता !

  4. बहुत बढ़िया वर्णन। मैं स्वंय चुराह घाटी का निवासी हूँ। भविष्य में कभी दोबारा आए तो जरूर मिलना। वैसे परांठे भी खिला दूंगा बस पंडित जी को साथ लाना मत भूलना।

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